Thursday, 2 August 2018

धड़कनो की सुनी तो तेरा फ़साना याद आया...कुछ भूली-बिसरी बातो का वो जमाना याद आया...गली

के मोड़ पर इंतज़ार मेरा करना,मुझे देखते ही अनजान बनने की कोशिश करना...नजदीक से गुजरने

पर कागज़ का टुकड़ा फेक देना और माफ़ी मांग कर बेवजह मुस्कुरा देना...कुछ कहने के लिए कभी

आँखों का तो कभी पलकों का यू ही झुका देना...उम्र भर का साथ मांग कर,उम्र भर मेरे साथ मेरी ही

दुनिया मे बस जाना...