Wednesday, 13 November 2019

                                    ''सरगोशियां,इक प्रेम ग्रन्थ''

सरगोशियां--जहां लिखे प्यार,प्रेम के शब्द,आप को अपने से जुड़े लगे..
सरगोशियां--जहां दर्द की लिखी भाषा आप को अपनी सी लगे..
सरगोशियां--जब विरह और जुदाई के मायने आप को रुला दे..
सरगोशियां--जहां प्रेमी अपनी प्रेमिका की याद मे घायल हो और आप उस अहसास को महसूस कर पाए ..
सरगोशियां--जहां शुद्ध प्रेम की प्रतीक''राधा''का रूप,इन शब्दों मे दिख जाये..
सरगोशियां--जहां प्रेम दूर जाने लगे और साथी को दर्द के आंसू दे जाये और आप महसूस कर पाए...
और भी बहुत कुछ,जो आप ''सरगोशियां,प्रेम ग्रन्थ''मे पढ़ सके गे...........आप की अपनी  ''शायरा ''
शामे तो रोज़ ही आए गी,पर अफ़सोस तेरी किसी शाम मे तेरे साथ हम नहीं आए गे..मसरूफ़ियत हो

या साथ तेरे कोई और हो,मुझे इस से क्या फर्क पड़ता है...तेरी शाम हसीं हो ना हो,अब मुझे क्या लेना

देना है...हमारी हसरतो का ज़नाज़ा जब उठ ही गया तो तेरी हसरतो से मुझे अब क्या करना है...दावा

इतना जरूर करते है,कुदरत अपने नायाब तोहफे धरती पे जयदा नहीं उतारा करती..बदकिस्मती तुम्हारी

है कि कोई राधा जन्म दुबारा नहीं लिया करती..
खुद को ले कर जितना गरूर उस मे आता गया उतना ही दूर हम उस से होते गए...वक़्त और ज़िंदगी

बार-बार नियामतें दिया नहीं करती..इतना समझने के लिए किसी को,कुदरत भेजा नहीं करती..कोई

बार बार पुकारे तुझ को और आवाज़ तेरे कानो को सुनाई ही ना दे तो वो आवाज़ हमेशा के लिए ही ग़ुम

हो जाए गी...बहुत सहा पर अब और नहीं..तुम तुम मे रहो,मैं खुद मे जिउ...ज़िंदगी ने अब सब कुछ ही

बदल डाला और हम सच मे दूर हो गए...
इबादत तेरी करे या मुहब्बत की..बात तो इबादत का अर्थ समझने की है..इबादत तुझ मे गरूर भर दे,तू

खुद को कही का राजा समझे..ऐसी इज़ाज़त नहीं देती मेरी इबादत..इबादत का इक रूप यह भी तो है..

तोड़ कर किसी कांच को हम ने उस के हज़ारों टुकड़े किए..हर टुकड़े को जोड़ा हर धर्म से,हर मजहब से..

साथ सब को मिलाना भी तो एक इबादत है..प्रेम और इबादत,दोनों ही कितने पावन है..अब हम अपनी

सरगोशियों को प्रेम ग्रन्थ से जय्दा ''महान प्रेम-ग्रन्थ'' बनाए गे..जहा प्रेम,मुहब्बत और प्यार सब ढले

गे इक ग्रन्थ के नीचे,समझ जिस की जितनी होगी,ग्रन्थ प्रेम को उतना ही समझ पाए गे...
बैठे है खुले आसमाँ के नीचे,मगर क्यों है बेहद ख़ामोशी यहाँ...कलम कह रही है क्यों ना लिखे ख़ामोशी

की दास्तां यहाँ...आज है ख़ामोशी खामोश यहाँ और यह कलम लिखती जा रही है क्या क्या यहाँ...जब

तक हम भी खामोश थे,ज़माना बहुत कुछ कहता रहा..कलम तब ना थी हाथ मे,जब यही ज़माना क्या

क्या उलझनें पेश करता रहा...कलम बोली,उठा मुझे और छा जा इस जहान पे..जो तू उठ गई,उलझनें

ज़माने की बढ़ जाए गी...डर के अब तू नहीं,ज़माना तुझ से डर जाए गा..राज़ सब तालो से खुल कर

सामने आ जाए गा...

Tuesday, 12 November 2019

जिसे तुम ने खोया,वो तेरा साया था..साया क्या वो तो तेरा हमसाया था...आज है जहां हम,वहां सिर्फ

जरुरतमंदो का इक सकून भरा मेला है..यहाँ हम झुक रहे है उन के कदमो मे,कदर के साथ-साथ दुआओ

का भी मेला है...हम देते रहे जिन को दुआएं,बदले मे लेते रहे उन की परेशानियों की वजहे..आज का दौर

कुछ और है,हम ले रहे है दुआएं और ना जाने कितनो के बने है मसीहा...इक हमराज़,इक हमसाया..
खुश है बहुत बिन बात के,नूर अपने ही चेहरे का देख दीवाने है,बिन बात के...पांव रखते है कही,पड़ते

है कही..बिन बात के...खुद ही खुद मे मुस्कुरा रहे है,क्यों..शायद यू ही बिन बात के...ज़िंदगी से कभी

शिकायतें थी हमे,रो देते थे बेवजह बिन बात के...है तो आज भी वही खड़े,मगर अंदर की आवाज़ ने

हिला दिया हमे..क्यों उदास रहे,क्यों अश्क बहाते रहे..परवरदिगार ने इतना जो दिया है,उसी के लिए

आज शुक्रगुजार है..खुश है बस.........बिन बात के....

                                    ''सरगोशियां,इक प्रेम ग्रन्थ'' सरगोशियां--जहां लिखे प्यार,प्रेम के शब्द,आप को अपने से ...