Monday, 29 May 2017

एक ख़ामोशी मेरी.. कह रही हज़ारो लफ्ज़ो के ताने-बाने मगर--समझने के लिए आज कोई शख्स कही

भी तो नहीं---ले लिया इन पन्नो का सहारा मगर--इन को पढ़  पाना भी अब किसी के लिए जरुरी ही

नहीं---कोई लफ्ज़ कहता है कहानी मेरी ज़िन्दगी के सुनहरे खवाबो की...तो कही छलका जाता है आंसू

झरनो की तरह बहते पानी की---मासूमियत आज भी है दिल के हर कोने मे..लेकिन उन खवाबो की

तामील करने के लिए आज कही कोई भी तो नहीं----