Saturday, 6 May 2017

फिर वही ज़लज़ले,फिर वही धुआँ धुआँ---कह रही यह ज़िन्दगी वक़्त का कहर है रूआ रूआ ---दिन

हुआ राते ढली ग़ुरबत मे बनी यह किस्मत हो गई खुद से बेवफा बेवफा---राज़ खोले दर्द ने,आंखे बनी

उस की गवाह..चुप रहू या बोल दू...आसमाँ से चाँद ने की इल्तिज़ा ना हारना कि अब भी इन साँसों मे

है रौशनी की फैली हुई इक अधूरी सी दास्ताँ---