Tuesday, 24 July 2018

ना छेड़ तार मेरे दिल के कि मेरा रब बसता है यहाँ....बार बार तागीद ना कर कि उस रब के सिवा कोई

और जचता ही नहीं यहाँ...नरम दिल से की तेरी गुजारिश को ना मान पाए गे कि इसी दिल की धड़कन

मे रब मेरा धड़कता है...दुनिया की चालबाज़ियों को ना झेल पाए कभी,इसीलिए रब को माना सब कुछ 

और लहू की हर बूंद मे अपने ही रब को बहने दिया हम ने....अब तू तार छेड़े या साथ देने का वादा भी

कर ले,मगर अब तो कोने कोने मे ,मेरा रब बसता है यहाँ.....

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चाँद मुखातिब है मुझ से फिर इक बार..क्यों जलता है मुझ से,ऐसा भी क्या है मुझ मे जो नहीं है तेरे पास..''प्यार की इंतिहा समझने के लिए...