Sunday, 15 July 2018

जो मिल गया वो नसीब था...जो ना मिला वो हसरतो का कोई दौर था ...मिलने पे ख़ुशी वाज़िब थी

हसरते पूरी ना होने का गम क्यों रहा...वक़्त तो देता ही रहा गवाही,पर समझ से परे ज़िंदगी मे तब

कुछ भी ना था...कुछ छोड़ दिया तो कुछ छूट गया...कुछ संभल गया तो कही सब बिखर गया....रेले

खुशियों के गर नहीं मिलते तो दर्द का मौसम भी जय्दा नहीं चलता...नसीब तो नसीब है,कभी चमक

गया तो कभी रात के अंधेरे के तले बिखर सा गया ...

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चाँद मुखातिब है मुझ से फिर इक बार..क्यों जलता है मुझ से,ऐसा भी क्या है मुझ मे जो नहीं है तेरे पास..''प्यार की इंतिहा समझने के लिए...