Wednesday, 21 March 2018

बचपन मे जो खिलौना टूटा,हम ज़ार ज़ार रोए थे.....उन टुकड़ों को समेटने के लिए,माँ की गोद मे फिर

से रोए थे....कुछ नया  पाने के लिए,मशक्कत बहुत की हम ने...नायाब पाने की चाहत मे,आंसुओ को

पोछ डाला हम ने....लबो पे फिर हसी उभरी,खिलौना नया अब हमारे हाथ मे था.....उम्र का यह कैसा

दौर है,जो रहा बहुत अपना...उसे खो कर क्यों ज़ार ज़ार आज भी रोते है....नायाब कुछ भी क्यों ना मिले

जो खोया,उसी को पाने की मशक्कत मे क्यों आज भी परेशां होते है....