Sunday, 9 April 2017

वो तेरी  काली  घनेरी पलके,आँखों के वो खूबसूरत शामियाने---मेरी दुल्हन हो या आसमाँ की कोई

शहज़ादी..आंचल मे समेटे हुए बेतहाशा अफ़साने...टुकर टुकर देखती हुई तेरी भोली मुस्कान की,हज़ारो

मासूम सी बिजलिया---कौन कहता है कि तुम इंसा हो..दुनिया से अलग,सदियों मे पैदा होने वाली---हो

सिर्फ मेरी ही दुल्हन---उन्ही यादो के कीमती ख़ज़ाने से,आज भी सजा है मेरा यह मन और तन..रहे थे

साथ सदा,रहे गे रूह से जुड़े..तेरे ही आंगन मे मिले गे रूह के छाँव तले----