Sunday, 9 April 2017

दुनियाँ की परवाह जो की होती,तो आज ज़िंदा न होते--हौसले से जो कदम ना बढ़ाये होते,तो आज अपनी

शर्तो पे कहाँ ज़ी पाते--गरम रेत पे पाँव रखने से जो डर जाते,यक़ीनन दहशत की आग मे खुद ही जल

जाते--दुनियाँ समझी हम तन्हा है,वो क्या जाने मेहबूब का साथ आज भी साथ है मेरे--खुदा की नियामतों

को रोज़ सलाम करते है,झुक जाते है उस के सज़दे मे--हर सांस को लेने से पहले,उस की रज़ा सुन लेते है--