Monday, 8 January 2018

नज़र तेरे चेहरे से क्यों हटती ही नहीं---यह कौन सा नूर है कि रौशनी चाँद की भी इस के आगे ठहरती

नहीं---आंखे है कि मय के प्याले है,डूब जाए गर तो बाहर आने की कोई हस्ती ही नहीं---ना कर अब

मदहोश इन गेसुओं को खोल कर,कि बेमौत मरने की अभी कोई मर्ज़ी ही नहीं-----बस...अब यू ना

खिलखिला कर इतना हसो,कि तुम्हे बाहों मे भरने के लिए...खुदा की भी इज़ाज़त जरुरी ही नहीं----