Wednesday, 17 January 2018

तलाशते रहे जिस मे खुद के वज़ूद को,वो यह कह कर हम से किनारा कर गए----तू मेरी आरज़ू नहीं

ना मेरे दिल का करार है --- हसरते तुझे देख कर दम तोड़ देती है,तेरे साथ मेरी ज़िंदगी की कोई ख़ुशी

कोई इकरार भी नहीं----तपती रेत की तरह बस झुलस कर रह गए हम---आँखों के समंदर मे खुद को

फना कर गए हम---यह कौन सा मक़ाम है,जो जल कर भी रोशन ना हो सकी..यह ज़िंदगी की कौन सी

शाम है----वो तो किनारा कर गए,हम मगर आज भी टूटे हुए दिल की कोई बेबस आस है-----

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चाँद मुखातिब है मुझ से फिर इक बार..क्यों जलता है मुझ से,ऐसा भी क्या है मुझ मे जो नहीं है तेरे पास..''प्यार की इंतिहा समझने के लिए...