Tuesday, 15 May 2018

मौसम की तरह जो बदलना होता तो कोई वादा ना करते....यह जो सुबह आई है,उस की बदौलत

अपनी नाकामयाबियों का खुले - आम तुझ से कभी इज़हार भी ना करते....मुहब्बत जो दबे पांव

दस्तक दे जाती है,जब तक समझ आती है तब तल्क़ खुद को सपुर्दे यार कर जाती है....खुद को खुद

से बेगाना करने के लिए कभी कभी अपने ही दिल के आर पार हो जाती है.....यह कौन सी शै है,जो

शीशे की तरह दिल मे उतरती तो है,पर ज़िंदगी को अपने आप से बस जुदा ही कर जाती है....