Friday, 2 February 2018

सुर ताल की महफ़िल मे,जो थिरके कदम तो रुक नहीं पाए....रातो का सकून पाने के लिए,किसी रात

भी हम सो नहीं पाए....घुँगरू की आवाज़ मे,किसी और आवाज़ को सुन नहीं पाए....ज़माना देता रहा

दस्तक,और हम..और हम रो भी नहीं पाए....तरसते रहे किसी ऐसी शाम के लिए,जो दिन का उजाला

बन कर हम से मिल लेती....घुंगरू बजते रहे,टूटते रहे..और हम हर रात मरते रहे,मरते रहे.....