Friday, 13 April 2018

चाँद की चांदनी की तरह आ तुझ मे सिमट जाए....रहे ना फासला कोई,तेरे ही वज़ूद मे ग़ुम हो जाए...

प्यार की इंतिहा कितनी है,यह सवाल तुम ने कई बार उठाया था....जहा जन्मो के बंधन की कोई सीमा

ना रहे,आसमां के खतम होने का कोई अंदेशा ना रहे....जहा रूहों के मिलन मे कोई ग़ुस्ताख़ नज़र ना

बचे,जब तू मेरे सामने हो,तो कोई पत्ता भी ना हिले....तेरे इक इशारे पे यह सांसे रुकने के लिए तैयार

रहे...अब तू ही बता इसे इंतिहा कहे या तेरे सवाल का जवाब कहे....