Sunday, 5 November 2017

करते है तागीद कितनी ही बार उन से,किसी रोज़ हम को मिलने आ जाओ...बीत रहे साल दर साल

कभी तो सूरत दिखा जाओ...किसी दिन जो रुक गई यह धड़कन हमारी,लौट के ना आए गे फिर ज़िंदगी

मे तुम्हारी...बुलाते रहो गे हज़ारो बार फिर तुम्ही हम को,ना उठ पाए गे तुझे इतने करीब से भी देख कर

मेरी हर बात को हवा मे उड़ा देने वाले,उड़े गे जिस रोज़ हवा मे हम ऐसे...तेरे आंसू पुकारे गे कि लौट आओ

बीते गे फिर साल दर साल,हम लौट के ना आए गे....