Friday, 9 November 2018

हसरतो का मेला जो लगा,दिल बेचैन होने लगा...कभी कही उड़ान भरने के लिए,यह मन कुलांचे भरने

क्यों लगा..काश..दौलत के ढेर होते,ऐशो से भरी ज़िंदगानी होती...ना तरसते किसी शै के लिए,रंग-बिरंगी

हमारी दुनिया होती...ढ़ोकर ना देता यह ज़माना,निगाहो मे सब के हमारा बसेरा होता..पर आज दिल का

नरम कोना बोला,जब सकून है तुझे रातो मे..नींद आ जाती है इन आँखों मे...जीने के लिए वो सब कुछ

है,परवरदिगार का साया हर पल है तो नरम कोने की ही सुन..आराम से सो जा और हसररतो को बस

अलविदा ही कर....

No comments:

Post a Comment

चाँद मुखातिब है मुझ से फिर इक बार..क्यों जलता है मुझ से,ऐसा भी क्या है मुझ मे जो नहीं है तेरे पास..''प्यार की इंतिहा समझने के लिए...