Wednesday, 3 October 2018

दर्द को छेड़ो गे तो वो ज़ख़्मी और हो जाए गा...रोने की वजह पूछो गे बरबस यह दिल और बरस जाए

गा...रातो के अंधेरो मे यह सिसकियां,तेज़ गहराया जाती है...तुझे याद कर के यह सारे ज़हान को ही

भूल जाया करती है....क्या कमी रह गई जो बादलों की गड़गड़ाहट से,आज भी डर जाया करते है....

बारिश की हल्की हल्की बूंदे..जब जब ठहरती है चेहरे पे...हम क्यों उदास हो जाया करते है...