''सरगोशियां इक प्रेम ग्रन्थ''....यहाँ लिखा हर शब्द प्रेम की अनूप-सुंगंधित भाषा का मालिक है..प्रेम ,बहुत ही पवित्र-पावन शब्द..लेकिन लोग इस शुद्ध प्रेम को भूल चुके है..सरगोशियां,प्रेम से जुड़े हर पहलू को लिखती है..सरगोशियां के लिए प्रेम इतना ही शुद्ध है जितना कृष्णा का मोर-पंख,जो हवा के हलके से झोके से भी हिल जाए मगर अपनी जगह पे कायम रहे..प्रेम राधा के उस मन की तरह,जो लाख बाधाओं के बाद भी मजबूत रहे..सरगोशियां की पुरजोर कोशिश रहे गी,आप सब तक इस रूहानी-प्रेम की मिसाल पेश करती रहे..प्रेम मे जब-जब शुद्धता खत्म होती है,वो प्रेम वो सम्बन्ध,वो रिश्ता हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाता है..कुदरत ऐसे-ऐसे इशारे देती है कि जो प्रेम युगो तक चलता वो एक झटके मे समाप्त हो जाता है...बेवफाई,आज इस के साथ तो कल किसी और के साथ..यह प्रेम हो ही नहीं सकता..सरगोशियां,हर रूप को अपनी कलम से लिखती है..यह कलम जब-जब लिखती है..बिंदास लिखती है..दोस्तों,कलम के लिखे हर लफ्ज़ को दिल से,रूह से महसूस करे..यह वफ़ा-बेवफा दोनों पे लिखती है..दर्द पे,टीस पे..प्यार के लरजते लफ्ज़,धोखा देते लफ्ज़..प्रेम को कभी यह सोच कर मत चले,कि यह तो अब मुझ से इतना प्रेम करता/करती है,तो अब इस कि परवाह क्यों करनी..जब-जब आप यह सोच बना लेते है,प्रेम उसी वक़्त आप के जीवन से हमेशा-हमेशा के लिए चला जाता है..जब तक आप को होश आता है,आप सब खो चुके होते है..कदर कीजिए सच्चे प्रेम की...सरगोशियां मे आप लफ्ज़ो की यह सारी कारीगरी ढूंढ पाए गे..सरगोशियां,जो आने वाली नस्लों को शुद्ध-प्रेम की भाषा-परिभाषा दे जाए गी..मगर आज के लोगो को भी प्रेम मे वफ़ा की सीख भी सिखाए गी..जब प्रेम मे आप ईमानदार नहीं है तो आप प्रेम करने लायक ही नहीं है..सरगोशियां,के सफर मे मेरे साथ चलिए और शुद्ध-प्रेम का सम्मान कीजिए.... आप की अपनी शायरा
Wednesday, 5 February 2020
दे कर रंग इन लबो को तेरे प्यार का.... .....
दे कर रंग इन लबो को तेरे प्यार का,हम ने अपने लबो को सिल लिया...कुछ कहते नहीं अब इस ज़माने से कि इन से कहने को अब बाकी रह क्या गया...नज़रे चु...
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तेरी उन बचकानी हरकतो को याद करतेे है हम..वो मुझ से रूठना फिर मना लेना. नही भूूल पाए है हम...आज ना वो बचपन है ना ऱिशतो की वो बाते...ना ...
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एक अनोखी सी अदा और हम तो जैसे शहज़ादी ही बन गए..कुछ नहीं मिला फिर भी जैसे राजकुमारी किसी देश के बन गए..सपने देखे बेइंतिहा,मगर पूरे नहीं हुए....
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आहटे कभी झूट बोला नहीं करती,वो तो अक्सर रूह को आवाज़ दिया करती है...मन्नतो की गली से निकल कर,हकीकत को इक नया नाम दिया करती है...बरकत देती ...