बदलते रहते जो मौसम की तरह-तो तेरे न हो पाते--बरस बरस कर जान दुसरो पे लुटाते-तो तेरे आँगन की खुशिया न बन पाते---मुहब्बत की बाज़ी जो जीती है हम ने -गर खुद के अरमानो को तेरा बनने पे मजबूर ना होते --इबादत की,सजदे किये तेरे आने की आहट से हम ने --हा यूँ सज सवर कर तेरे मुकम्मल न बन पाते ---
Saturday, 19 December 2015
दे कर रंग इन लबो को तेरे प्यार का.... .....
दे कर रंग इन लबो को तेरे प्यार का,हम ने अपने लबो को सिल लिया...कुछ कहते नहीं अब इस ज़माने से कि इन से कहने को अब बाकी रह क्या गया...नज़रे चु...
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तेरी उन बचकानी हरकतो को याद करतेे है हम..वो मुझ से रूठना फिर मना लेना. नही भूूल पाए है हम...आज ना वो बचपन है ना ऱिशतो की वो बाते...ना ...
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आहटे कभी झूट बोला नहीं करती,वो तो अक्सर रूह को आवाज़ दिया करती है...मन्नतो की गली से निकल कर,हकीकत को इक नया नाम दिया करती है...बरकत देती ...
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एक अनोखी सी अदा और हम तो जैसे शहज़ादी ही बन गए..कुछ नहीं मिला फिर भी जैसे राजकुमारी किसी देश के बन गए..सपने देखे बेइंतिहा,मगर पूरे नहीं हुए....