Wednesday, 5 February 2020

हवाओं मे रंग किस प्यार का है..यह रंग साफ़-पाक नहीं,यह तो देह से बंधा अपराध है..प्यार,जो ना

मोहताज़ है किसी खास तारीख का...प्यार,जो रूहों का संसार है..जो साथी की इक मुस्कान से खिल

जाए,जो उस की ख़ामोशी को समझ जाए..जो उस के लिए हज़ारो दर्द झेल जाए..ग़ुरबत मे भी प्यार को

निभा जाए..सूरत को तबज़्ज़ो कौन देता है, प्रेम शुद्ध है जहां वहां मिलना भी जरुरी कहां होता है.''.आज

तू है साथ तो कल कोई और होगी,उस के बाद कोई और होगा'' प्यार आज यहाँ खामोश है क्यों कि कल

उस को किसी और के साथ वहां जाना होगा..

Tuesday, 4 February 2020

देह के मोल कहां रहे जब रूह ने रूह को स्वीकार किया..इज़ाज़त किस से लेनी,रूह अब किसी बंदिश

 मे ही नहीं...तुझ से मिलने के लिए तुझ को देखने के लिए,अब उदास क्यों होना..रूहों की गुफ्तगू जो

अब बेमिसाल है..सदियों से जो तेरे साथ तेरे पास थी..पल पल आज भी तेरे साथ है..उदास तुम भी ना

होना,बस रूह से मुझ को महसूस करना..देह का क्या है,यह तो मिट ही जानी है..बस रूह से हम

तेरे है और आप मेरे है..यह बात जब खुद रूहों ने पहचानी है...
मायने प्रेम और खूबसूरती के क्या होते है...यह सवाल जब पूछा उस ने,जवाब हमारा था..जब हमारी

आँखों मे सच्चाई आप को नज़र आए..दिल की आंखे बंद करे तो तस्वीर हमारी ही नज़र आए..नींद

की बेला मे जब हमारी हंसी खनकती सी सुनाई दे..सिर्फ आप को एहसास भर से, हमारी सूरत

से कही जयदा हमारी सीरत नज़र आए..पूजा के थाल मे इबादत हमारी आप को नज़र आए..हमारे 

लिए तो प्रेम और खूबसूरती के मायने यही तक है...
हर शाम गर हर शाम जैसी होती तो अपनी शाम का इंतज़ार क्यों होता..वादियों मे ढलता सूरज गर रोज़

एक ही पैगाम देता तो सूरज के ढलने का इंतज़ार रोज़ कौन करता..चाँद रोज़ सम्पूर्ण होता तो उस के

आधे रूप को कौन जान पाता...घटा संग रोज़ चाँद रहता तो चांदनी के हसीन प्यार से मिलने चाँद क्यों

बार-बार अपनी चांदनी से मिलने आता..बादलों के घिर आने पर,बरखा के बरसने पर..यह चाँद ही

दुखी जयदा होता है..चांदनी तो उस से मिलने के लिए,सिर्फ दुआओ मे उसे देखा करती है...

Monday, 3 February 2020

बिखर चुके है तेरी ज़िंदगी मे,गुलाब की अनगिनित पखुड़ियो की तरह..तू समेट ले इन को अपने हर

दर्द मे इक खुश्बू की तरह..जब तल्क़ तू समेटे गा इन्हे,यह और बिख़र जाए गी तेरी राहो मे तेरी ही

ज़िंदगी बन कर..हमारा काम तो बिखरना है खुशबू की तरह..तुझ से कुछ ना मांगे गे कि खुद ही इक

गुलिस्तां के मालिक है हम..एक ऐसा गुलिस्तां जो बिखेरता है सिर्फ खुशबू मगर,खुद को रखता है

जुदा किसी एहसास से परे...चल छोड़ ना,समेट इन पखुड़ियो को अपनी ख़ुशी के लिए...
शब्दों को शब्दों के साथ जोड़ रहे है..मगर यह क्या,इन शब्दों को तेरे साथ की आज जरुरत क्यों है..

तुझ से मिले नहीं है,यह खबर हर परिंदे को क्यों है..पंख फैलाए सारा जहां घूम आए यह परिंदे,आँखों

मे इन के नमी क्यों है..जवाब तो इन के पास भी नहीं है तभी तो ख़ामोशी से यह सर झुकाए है..दर्द है

इन सभी की आँखों मे,यह तो हमे भी रुलाने पे आमदा है..लौट आओ जहां भी हो,मासूम परिंदो को यू

रुलाना तेरी-मेरी फितरत कहां है..

Saturday, 1 February 2020

दर्द-दुखो को देखा है इतने करीब से,कि अब तो इन तमाम दुखो को अपना दोस्त बना लिया..रोज़ मिलते

है इन से,मगर इन से अब डरते नहीं..इस से पहले यह आए हमारे पास हमारा हाल पूछने,हम खुद ही

इन को प्यार कर आते है..लोग कहते है,हम इतना क्यों मुस्कुराते है और क्यों..जब इन दुखो ने हम से

दुश्मनी ही निभानी है तो क्यों ना हंस कर,मुस्कुरा कर खुद ही इन से दोस्ती कर ले..अब यह दुःख भी

हमारी हिम्मत की दाद देते है,इन के साथ रह कर भी बहुत खुश जो रहते है..

दे कर रंग इन लबो को तेरे प्यार का.... .....

 दे कर रंग इन लबो को तेरे प्यार का,हम ने अपने लबो को सिल लिया...कुछ कहते नहीं अब इस ज़माने  से कि इन से कहने को अब बाकी रह क्या गया...नज़रे चु...