Tuesday, 10 July 2018

जरूरतों की नगरी .... यह जरुरतो के शहर....कुछ भी नहीं मिला ऐसा जो दे सके सकूने -दिल का

वो महका सा सफर...कही था दौलत का नशा तो कही था जिस्मो की जरूरतों का वो बदला बदला

एक ज़हरीला सा नशा....मासूम हसी की तलाश मे कितनी दूर निकल आए... लोगो की नज़रो मे

ईमान ढूंढ़ने को तरस तरस गए....पूरे जहाँ को देखने की ताकत ही नहीं,डर लगता है कही ज़िंदगी का

और बुरा रूप नज़र ना आ जाए....

Monday, 9 July 2018

रास्तो मे धूल जमती रही और हम साफ़ करते रहे....लफ्ज़ो के चलते चलते,ज़िंदगी का रुख बदलते

रहे....इंतज़ार था उस सावन का,जो बरसे इतना कि यह रास्ते फिर से निखर जाए....हाथ जोड़ कर

उस मालिक से दुआ पे दुआ करते रहे...कितने ही सावन आए और चले गए,शायद धूल थी इतनी

गहरी कि सावन भी उन को सवार नहीं पाए...थक कर छोड़ा तमाम रास्तो को और खुली हवा मे सांस

लेने चले आए....

Sunday, 8 July 2018

मुहब्बत कितना करते है आप से,जान लुटाते है कितनी आप पे...आप की एक उदासी से परेशाँ हो जाते

है किसी खौफ से...नज़र ना लगे ज़माने की,बार बार नज़र उतारते है किसी अनजानी वजह के धयान

से...मुहब्बत जताने से जय्दा तो नहीं होती...बस परदे मे रहे इस ख्याल से,सज़दा भी करते है आप का

बिना बताए भगवान् से...इस से जय्दा आप को क्या कहे कि कितनी जान लुटाते है हम आप पे...
बारिश की हलकी हलकी बूंदे रेत मे समा जाती है...ना जाने कितनी तपिश है उस रेत मे,जो हज़ारो

बूंदो को खुद मे जज्ब कर जाती है...धूप की किरणों से यह रेत,फिर उजली हो जाती है...लगता है

जैसे वो खुद को खुद मे निखार लाती है...इसी रेत को हाथो मे लिए,खुद की ज़िंदगी पे नज़र करते

है....हज़ारो दुखो को खुद मे जज्ब कर के, हर जगह खुल के हसते है....ज़माना रश्क करता है हमारी

किस्मत पे,और एक हम है कि अकेले मे हर सैलाब इन्ही आँखों से बहा जाते है.....

Monday, 2 July 2018

बरसा तो बरसा आज सावन इतना कि दिल का दर्द हवा हो गया...तूफानी बौछारों से किन्ही यादो से

मन गुदगुदा गया...जी चाहा आज भी उतना ही भीग जाए इस मौसम मे,बरसो पहले भीगते थे जैसे

लड़कपन मे...सिर्फ एहसास था छोटी छोटी बातो का,झगड़ा था कागज़ की बनी उस नौका का...लौट

कर वो वक़्त कब आता है,मगर यह सावन हमेशा याद वही सब दिला जाता है....
क्यों नहीं लगा उस को कि किस्मत की लकीरो के आगे सर झुका चुके है हम...कुदरत के फैसलों को

पूरी तरह स्वीकार कर चुके है हम...राह तेरी ना अब देखे गे किसी और के साथ अब बंध चुके है हम...

जिस्मो-जान की कीमत क्या होती है,यह तो पता नहीं...मगर रूह की बात सुने तो यक़ीनन रूह को

तो रूह तेरी के साथ कब से जोड़ चुके है हम...यह जिस्म तो आखिर मिट ही जाया करते है,रूह को

रूह से करीब  करने के लिए अगले जनम की बात सोच चुके है हम....

Sunday, 1 July 2018

बहुत प्यारी सी महक है आज इन हवाओ मे...लगता है किसी ने हम को दुआओ मे अपनी आज 

निखारा है....दिल की धडकनो मे कोई जादू सा है,शायद किसी ने रूह से अपनी हम को पुकारा है 

आँखों की पलकों मे कुछ भारीपन सा है..क्या किसी ने अपने सपनो की नगरी मे आने को पुकारा

है....नज़र उठती है तो कभी गिरती है,मुस्कान लबो पे अनायास क्यों रुक जाती है....कुदरत के

इशारे को समझने के लिए,इन हवाओ ने क्यों अपने  को यू महकाया है....

दे कर रंग इन लबो को तेरे प्यार का.... .....

 दे कर रंग इन लबो को तेरे प्यार का,हम ने अपने लबो को सिल लिया...कुछ कहते नहीं अब इस ज़माने  से कि इन से कहने को अब बाकी रह क्या गया...नज़रे चु...